AP TET 2026 | PAPER IIA Hindi | Language HINDI Content
Exam Date: 12 August, 2026
AP TET 2026 पेपर II-A (हिंदी), सेट A, शिफ्ट 1 की परीक्षा SCERT द्वारा 12 अगस्त 2026 को आयोजित की गई। इस पोस्ट में सेक्शन-IV: भाषा-I (हिंदी) कंटेंट के प्रश्न 91 से 138 संक्षिप्त व्याख्या सहित दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर सोचिए, फिर "उत्तर और व्याख्या देखें" पर टैप कीजिए।
ध्यान दें: यह उत्तर-कुंजी अभ्यास के लिए है। आधिकारिक उत्तर-कुंजी से मिलान अवश्य कीजिए (tet2dsc.apcfss.in)।
सेक्शन-IV: भाषा-I (हिंदी) कंटेंट – प्रश्न 91–138
91हिंदी साहित्य के इस काल को सिद्ध - सामंत युग भी कहा जाता है -
- भक्तिकाल
- वीरगाथाकाल
- आधुनिक काल
- रीतिकाल
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) वीरगाथाकाल
नोट: विकल्प 2 यानी वीरगाथाकाल, जिसे आदिकाल भी कहा जाता है, इस प्रश्न का सही उत्तर है।
अवधारणा और ऐतिहासिक सिद्धांत: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के इतिहास के 'कालविभाजन और नामकरण' (Nomenclature of Hindi Literature) पर आधारित है। हिंदी साहित्य के प्रथम काल (उत्पत्ति काल) के नामकरण को लेकर विभिन्न विद्वानों में मतभेद रहे हैं:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल में वीरतापूर्ण रासो काव्यों की प्रधानता को देखते हुए इसे 'वीरगाथाकाल' नाम दिया था।
इसी कालखंड को महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 'सिद्ध-सामंत काल' (या सिद्ध-सामंत युग) कहा था। उन्होंने सिद्धों की धार्मिक रचनाओं और सामंतों के आश्रय में लिखे गए चारण काव्यों के आधार पर यह नामकरण किया था।
सामान्यतः इस पूरे कालखंड को सर्वमान्य रूप से 'आदिकाल' (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रदत्त नाम) के रूप में जाना जाता है। अतः वीरगाथाकाल (आदिकाल) ही वह काल है जिसे सिद्ध-सामंत युग भी कहा जाता है।
92आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार भक्तिकाल का समय है।
- संवत 1375 से 1700 तक
- संवत 1700 से 1900 तक
- संवत 1775 से 1975 तक
- संवत 1900 से 1975 तक
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) संवत 1375 से 1700 तक
अवधारणा और ऐतिहासिक सिद्धांत: यह प्रश्न आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा किए गए 'हिंदी साहित्य के इतिहास के कालविभाजन' (Chronological Classification of Hindi Literature) पर आधारित है। आचार्य शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929) में संपूर्ण कालखंड को चार स्पष्ट भागों में विभाजित किया है और उनका समय विक्रमी संवत (संवत) में इस प्रकार निर्धारित किया है:
- आदिकाल (वीरगाथाकाल): संवत 1050 से 1375 तक
- पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल): संवत 1375 से 1700 तक
- उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल): संवत 1700 से 1900 तक
- आधुनिक काल (गद्यकाल): संवत 1900 से 1984 (या अब तक)
चूँकि प्रश्न में स्पष्ट रूप से भक्तिकाल का समय पूछा गया है, इसलिए संवत 1375 से 1700 तक का विकल्प पूर्णतः सत्य और प्रामाणिक है।
93आदिकाल को चारण काल की संज्ञा देने वाला ये थे ।
- डॉ. रामकुमार वर्मा
- डॉ. गुलाबराय
- पं. रामचंद्र शुक्ल
- डॉ. ग्रियर्सन
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) डॉ. रामकुमार वर्मा और (4) डॉ. ग्रियर्सन
नोट: इस प्रश्न के दो सही विकल्प हैं - 1 और 4। हिंदी साहित्य के इतिहास में इन दोनों विद्वानों ने आदिकाल को 'चारण काल' कहा है।
अवधारणा और ऐतिहासिक सिद्धांत: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के इतिहास के 'आदिकाल के नामकरण' (Nomenclature of Aadikal) विषय पर आधारित है। आदिकाल के नामकरण को लेकर विभिन्न इतिहासकारों के अपने-अपने मत रहे हैं:
डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन: उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'The Modern Vernacular Literature of Hindustan' (1889) में हिंदी साहित्य के प्रारंभिक कालखंड को सबसे पहले 'चारण काल' (Charan Kaal) नाम दिया था।
डॉ. रामकुमार वर्मा: उन्होंने अपने ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' में इस काल को दो भागों में विभाजित करते हुए 'संधि काल एवं चारण काल' कहा था।
चूँकि ग्रियर्सन ने सबसे पहले इस नाम का प्रयोग किया और डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी इसे अपने कालविभाजन का मुख्य हिस्सा बनाया, इसलिए विकल्प 1 और 4 दोनों ही इस संज्ञा से सीधे तौर पर संबंधित हैं।
94रासो काव्य की भाषा यह है ।
- बुंदेली अथवा डिंगल
- गुजराती अथवा डिंगल
- राजस्थानी अथवा डिंगल
- ब्रज अथवा डिंगल
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) राजस्थानी अथवा डिंगल
अवधारणा और साहित्यिक सिद्धांत: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के आदिकाल (वीरगाथाकाल) की सबसे प्रमुख काव्य-परंपरा, 'रासो काव्य' की भाषाई विशेषताओं पर आधारित है।
आदिकालीन रासो काव्यों (जैसे- पृथ्वीराज रासो, खुमान रासो) की रचना मुख्य रूप से राजस्थान के चारण और भाट कवियों द्वारा की गई थी। इस युग के वीर रस के काव्यों में मुख्य रूप से डिंगल शैली का प्रयोग किया गया है। डिंगल कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है, बल्कि यह अपभ्रंश और राजस्थानी भाषा के मिश्रण से बनी एक विशिष्ट साहित्यिक शैली है, जिसके कठोर और ओजपूर्ण शब्द वीर रस की अभिव्यक्ति के लिए अत्यंत उपयुक्त माने जाते थे। (इसके विपरीत, अपभ्रंश और ब्रजभाषा के मेल को पिंगल कहा जाता था, जो मुख्य रूप से शृंगार रस के लिए प्रयुक्त होती थी)। अतः रासो काव्य की मुख्य भाषाई पहचान राजस्थानी अथवा डिंगल से जुड़ी हुई है।
95गोस्वामी तुलसीदास की रचना यह है ।
- रामचरित मानस
- भरत मिलाप
- रामभजन मंजरी
- राउलवेल
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) रामचरित मानस
अवधारणा और साहित्यिक सिद्धांत: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की 'सगुण काव्यधारा' (रामाश्रयी शाखा) के सर्वोपरि कवि गोस्वामी तुलसीदास और उनकी अमर कृति पर आधारित है।
रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास जी का सबसे प्रसिद्ध और कालजयी महाकाव्य है, जिसकी रचना उन्होंने अवधी भाषा में दोहा-चौपाई शैली में की थी।
अन्य विकल्पों की बात करें तो, 'भरत मिलाप' ईश्वरदास की रचना है, 'रामभजन मंजरी' अग्रदास की कृति है, और 'राउलवेल' आदिकालीन कवि रोडा की शिलांकित कृति है। अतः विकल्प 1 पूर्णतः सही है।
96ये वल्लभाचार्य के शिष्य थे ।
- कबीरदास
- कालीदास
- सूरदास
- भिखारीदास
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) सूरदास
- अवधारणा: यह प्रश्न भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवियों और उनके गुरुओं के संबंधों पर आधारित है।
विवरण: महाकवि सूरदास कृष्णभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि हैं। उनके गुरु आचार्य वल्लभाचार्य थे। वल्लभाचार्य जी ने ही सूरदास को पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया था और उन्हें श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन करने का कार्य सौंपा था। वल्लभाचार्य के चार शिष्यों (सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास) को मिलाकर बाद में 'अष्टछाप' की स्थापना हुई थी।
अन्य विकल्पों में कबीरदास के गुरु रामानंद थे, कालीदास संस्कृत के महाकवि हैं, और भिखारीदास रीतिकाल के कवि हैं।
97गागर में भाव का सागर भरने वाले दोहे इस कवि के हैं ।
- भूषण
- कविवर बिहारी
- प्रतापसाहि
- भिखारीदास
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) कविवर बिहारी
- अवधारणा: यह प्रश्न रीतिकाल के प्रसिद्ध कवियों की काव्यगत विशेषताओं पर आधारित है।
विवरण: महाकवि बिहारी अपनी एकमात्र रचना 'बिहारी सतसई' के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने दोहों में बहुत कम शब्दों में बहुत गहरा अर्थ (भाव) व्यक्त किया है। इसी विशेषता के कारण आलोचकों ने उनकी प्रशंसा में कहा है कि उन्होंने "गागर में सागर" (थोड़े में बहुत कुछ कहना) भर दिया है।
उनके दोहों के बारे में यह उक्ति भी प्रचलित है:
"सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।।"
98रामचंद्र शुक्ल के अनुसार रीतिकाल के प्रवर्तक इन्हें माना जाता है -
- भिखारीदास
- घनानंद
- आलम
- चिंतामणि त्रिपाठी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (4) चिंतामणि त्रिपाठी
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के काल-विशेष (रीतिकाल) के आरंभ और उसके प्रवर्तक को लेकर विद्वानों के मतभेद और इतिहास लेखन की दृष्टि को परखता है।
विवरण: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में चिंतामणि त्रिपाठी को रीतिकाल का अखंडित परंपरा का प्रवर्तक माना है। उनका मानना था कि रीतिकायों की जो अखंड परंपरा चली, वह चिंतामणि के 'कविकुलकल्पतरु' आदि ग्रंथों से ही शुरू हुई।
विशेष बिंदु: हालांकि कालक्रम की दृष्टि से केशवदास (1555 ई.) चिंतामणि (1609 ई.) से पहले आते हैं, लेकिन शुक्ल जी के अनुसार केशवदास के बाद रीतिकाव्य की वह अखंड परंपरा तुरंत प्रवाहित नहीं हुई, जो चिंतामणि से लगातार आगे बढ़ी। इसलिए शुक्ल जी चिंतामणि को ही रीतिकाल का प्रवर्तक स्वीकार करते हैं।
99पं. कृष्ण शंकर शुक्ल के शब्दों में “ये आधुनिक काल के प्रथम प्रौढ़ लेखक थे” ।
- रामनारायण
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
- पं. बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
- प्रताप नारायण मिश्र
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) भारतेंदु हरिश्चंद्र
- अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी आलोचना और साहित्यकारों के उपनाम/विशेषताओं पर केंद्रित है।
विवरण: भारतेंदु हरिश्चंद्र को 'हिंदी नवजागरण का अग्रदूत' और 'आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह' माना जाता है। पं. कृष्ण शंकर शुक्ल और अन्य कई विद्वानों का मानना है कि भारतेंदु जी ने ही सबसे पहले हिंदी गद्य को एक व्यवस्थित, परिष्कृत और 'प्रौढ़' (Mature) रूप प्रदान किया। उनसे पहले की हिंदी या तो बहुत संस्कृतनिष्ठ थी या उर्दू-फारसी से बहुत अधिक प्रभावित थी। भारतेंदु जी ने 'खड़ी बोली' को निखारकर उसे साहित्य के योग्य और जन-सामान्य की भाषा बनाया, इसलिए उन्हें "आधुनिक काल का प्रथम प्रौढ़ लेखक" कहा गया है।
100ये आधुनिक हिंदी काव्य धारा के द्वितीय उत्थानकाल के प्रवत्तक हैं ।
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
- हजारी प्रसाद द्विवेदी
- राजा शिव प्रसाद 'सितारे हिंद'
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
अवधारणा: यह प्रश्न आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में आधुनिक काल (गद्य काल) के उप-विभाजनों (प्रथम, द्वितीय और तृतीय उत्थान) के प्रवर्तकों की समझ का परीक्षण करता है।
विवरण: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आधुनिक काल के विकास को अलग-अलग उत्थानों में विभाजित किया है। उनके अनुसार, 'द्वितीय उत्थान' (जिसे सामान्यतः 'द्विवेदी युग' कहा जाता है) का समय संवत् 1950 से 1975 (सन् 1893 से 1918 ई.) तक माना गया है। इस कालखंड में हिंदी भाषा के परिमार्जन, व्याकरण सम्मत शुद्धता और खड़ी बोली कविता को प्रतिष्ठित करने का मुख्य श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को जाता है। उन्होंने वर्ष 1903 से 'सरस्वती' पत्रिका के संपादन द्वारा इस पूरे युग का नेतृत्व और प्रवर्तन किया था।
- अन्य विकल्पों में, भारतेंदु हरिश्चंद्र प्रथम उत्थान (भारतेंदु युग) के प्रवर्तक माने जाते हैं
101छायावाद को इन्होंने "स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह" कहा है ।
- आचार्य शुक्ल
- डॉ.रामकुमार वर्मा
- डॉ. नगेंद्र
- नरेंद्र शर्मा
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) डॉ. नगेंद्र
अवधारणा: यह प्रश्न छायावादी काव्य की मूल चेतना को परिभाषित करने वाले विभिन्न विद्वानों के आलोचनात्मक दृष्टिकोण की समझ का परीक्षण करता है।
विवरण: प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नगेंद्र ने छायावाद की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उसे "स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह" कहा है। इसका अर्थ यह है कि द्विवेदी युग की जो कविताएँ केवल उपदेशात्मक, मर्यादावादी और बाहरी संसार (स्थूल) के वर्णन तक सीमित थीं, उनके विरोध में छायावादी कवियों ने आंतरिक अनुभूतियों, कल्पना, प्रेम और सौंदर्य (सूक्ष्म) को अपनी कविताओं का आधार बनाया। यह हिंदी साहित्य की सबसे प्रसिद्ध और बार-बार पूछी जाने वाली परिभाषाओं में से एक है।
102प्रगतिवादी रचनाकार 'नागार्जुन' का असली नाम यह है ।
- रमनरेश मिश्र
- वैद्यनाथ मिश्र
- कन्हैया लाल मिश्र
- बुद्धिनाथ मिश्र
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) वैद्यनाथ मिश्र
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के प्रमुख रचनाकारों के मूल नाम (Original Name) और उनके द्वारा अपनाए गए साहित्यिक उपनामों (Pen Names) की जानकारी का परीक्षण करता है।
विवरण: प्रगतिवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि नागार्जुन का वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र था। वे मैथिली भाषा में 'यात्री' उपनाम से कविताएँ लिखते थे। बाद में बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद उन्होंने अपना नाम 'नागार्जुन' रख लिया, जिससे वे हिंदी साहित्य जगत में अमर हुए। उन्हें जनकवि भी कहा जाता है।
103कवि अज्ञेय के इस संग्रह से प्रयोगवादी काव्य का प्रारंभ माना जाता है ।
- प्रतीक
- स्वप्न भंग
- तार सप्तक
- धूप के धान
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) तार सप्तक
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी साहित्य में साहित्यिक आंदोलनों की शुरुआत करने वाले युगांतरकारी काव्य संग्रहों और पत्रिकाओं के प्रकाशन वर्ष की समझ को परखता है।
विवरण: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' के संपादन में वर्ष 1943 ई. में 'तार सप्तक' का प्रकाशन हुआ था। इस संग्रह में सात नवीन कवियों की कविताओं को शामिल किया गया था, जिन्होंने पारंपरिक काव्य पद्धतियों से हटकर नए प्रयोग किए। हिंदी साहित्य के इतिहास में इसी 'तार सप्तक' के प्रकाशन वर्ष (1943 ई.) से ही 'प्रयोगवाद' का उदय और प्रारंभ स्वीकार किया जाता है।
अन्य विकल्पों में 'प्रतिक' एक पत्रिका थी, जबकि 'स्वप्न भंग' और 'धूप के धान' अन्य कवियों की रचनाएँ हैं।
104'चित्ररेखा' इस कवि की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृतियों में एक है । यह रचना रहस्यवाद की उच्चतर भूमिका प्राप्त करती है ।
- मैथिलीशरण गुप्त
- डॉ. रामकुमार वर्मा
- जयशंकर प्रसाद
- माखनलाल चतुर्वेदी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) डॉ. रामकुमार वर्मा
अवधारणा: यह प्रश्न छायावादी युग के समांतर चलने वाली रहस्यवादी काव्यधारा के कवियों और उनकी विशिष्ट कृतियों की प्रवृत्तियों की समझ को परखता है।
विवरण: 'चित्ररेखा' डॉ. रामकुमार वर्मा का एक प्रसिद्ध काव्य संग्रह है (ध्यान रहे कि मलिक मोहम्मद जायसी की भी एक लघु प्रेमाख्यानक रचना का नाम 'चित्ररेखा' है, परंतु यहाँ विकल्पों के अनुसार यह डॉ. रामकुमार वर्मा की कृति है)। डॉ. रामकुमार वर्मा के काव्य में छायावादी प्रवृत्तियों के साथ-साथ अलौकिक सत्ता के प्रति प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति है, जिसे साहित्य में रहस्यवाद कहा जाता है। इनकी इस कृति में रहस्यवादी भावनाएँ अपने उच्चतम स्तर पर दिखाई देती हैं। उनके अन्य प्रसिद्ध काव्य संग्रहों में 'अंजलि', 'रूपराशि' और 'निशीथ' शामिल हैं।
105"चिदम्बरा" महाकाव्य इनकी रचना है ।
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- जयशंकर प्रसाद
- सुमित्रानंदन पंत
- रामधारीसिंह दिनकर
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) सुमित्रानंदन पंत
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों की युगांतरकारी रचनाओं और उनके ऐतिहासिक महत्व की जानकारी का परीक्षण करता है।
विवरण: 'चिदम्बरा' प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत का एक अत्यंत प्रसिद्ध काव्य संग्रह है। इस कृति का हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि इसी रचना के लिए सुमित्रानंदन पंत को वर्ष 1968 में हिंदी साहित्य का पहला 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' (Gyanpith Award) प्रदान किया गया था। इस कृति में पंत जी की चेतना का विकास (छायावाद से लेकर प्रगतिवाद और अंततः अरविंद दर्शन से प्रभावित आध्यात्मिक चेतना) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
अभ्यास'उर्वशी' (Urvashi) नामक प्रसिद्ध काव्य-नाटक के रचयिता कौन हैं, जिसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था?
- जयशंकर प्रसाद
- रामधारी सिंह 'दिनकर'
- सुमित्रानंदन पंत
- महादेवी वर्मा
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) रामधारी सिंह 'दिनकर'
व्याख्या: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' को उनकी प्रसिद्ध काम-अध्यात्म और दर्शन पर आधारित रचना 'उर्वशी' (1961 ई.) के लिए वर्ष 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
106आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी को ही हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी माना है । यह कहानी 'टेम्पेस्ट' का अनुवाद है ।
- रानीकेतकी कहानी
- कानों में कंगना
- आत्माराम
- इंदुमति
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (4) इंदुमति
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी गद्य विधाओं (विशेषकर कहानी विधा) के उद्भव, विकास और प्रथम रचना को लेकर इतिहासकारों की मान्यताओं का परीक्षण करता है।
विवरण: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' ग्रंथ में वर्ष 1900 ई. में 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी 'इंदुमति' को हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी स्वीकार किया है। आलोचकों का मानना है कि यह कहानी प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर के नाटक 'द टेम्पेस्ट' (The Tempest) की छाया लेकर या उससे प्रभावित होकर लिखी गई थी।
अन्य विकल्पों में 'रानी केतकी की कहानी' इन्शा अल्ला खाँ की है, 'कानों में कंगना' राधिकारमण प्रसाद सिंह की और 'आत्माराम' मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी है।
107भीष्म साहनी का प्रमुख उपन्यास यह है ।
- तमस
- बलचनमा
- दो एकांत
- गुनाहों का देवता
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) तमस
अवधारणा: यह प्रश्न स्वातंत्र्योत्तर (आजादी के बाद के) हिंदी उपन्यासों और उनके लेखकों की प्रसिद्ध कृतियों की पहचान परखता है।
विवरण: 'तमस' (1973 ई.) भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध और कालजयी उपन्यास है। यह उपन्यास 1947 के भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें सांप्रदायिक दंगों, मानवीय त्रासदियों और सामाजिक परिस्थितियों का जीवंत चित्रण किया गया है। इस महान रचना के लिए भीष्म साहनी को वर्ष 1975 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- बलचनमा — यह नागार्जुन का प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास है।
- दो एकांत — यह नरेश मेहता का उपन्यास है।
- गुनाहों का देवता — यह धर्मवीर भारती का अत्यंत लोकप्रिय और भावुकतापूर्ण उपन्यास है।
108मोहन राकेश का नाटक यह है ।
- न्याय की रात
- आषाढ़ का एक दिन
- देवदासी
- राजमुकुट
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) आषाढ़ का एक दिन
अवधारणा: यह प्रश्न आधुनिक हिंदी नाटक विधा के विकास और उसके युग-प्रवर्तक नाटककारों की कालजयी कृतियों की पहचान से संबंधित है।
विवरण: 'आषाढ़ का एक दिन' (1958 ई.) मोहन राकेश द्वारा रचित आधुनिक हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और युगांतरकारी नाटक है। यह नाटक महाकवि कालिदास के काल्पनिक जीवन, उनके अंतद्वंद्व, प्रेम (मल्लिका के साथ) और राज्याश्रय के टकराव पर आधारित है। इस रचना को आधुनिक हिंदी नाटक का प्रथम ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक नाटक माना जाता है, जिसके लिए मोहन राकेश को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला था। उनके अन्य प्रसिद्ध नाटक 'लहरों के राजहंस' और 'आधे-अध अधूरे' हैं।
109मेरठ मंडल देहरादून, दिल्ली, बिजनौर क्षेत्रों में यह बोली प्रचलित है ।
- बुंदेली
- कन्नौजी
- खड़ीबोली
- अवधी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) खड़ीबोली
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी भाषा की उपभाषाओं (Sub-languages) और उनकी बोलियों के क्षेत्रीय वितरण (Geographical Distribution) की समझ का परीक्षण करता है।
विवरण: खड़ीबोली (जिसे 'कौरवी' भी कहा जाता है) पश्चिमी हिंदी उपभाषा के अंतर्गत आती है। इसका मुख्य क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के आसपास का इलाका है। मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून (मैदानी भाग), रामपुर, मुरादाबाद और दिल्ली के देहाती क्षेत्र इसके मुख्य केंद्र हैं। मेरठ की खड़ीबोली को ही हिंदी की मानक (Standard) भाषा का आधार माना गया है।
अन्य विकल्पों में: बुंदेली (बुंदेलखंड क्षेत्र), कन्नौजी (कन्नौज, फर्रुखाबाद क्षेत्र) और अवधी (अयोध्या, लखनऊ, प्रयागराज क्षेत्र) में बोली जाती है।
110ब्रजभाषा का केंद्रीय क्षेत्र यह है ।
- लखनऊ
- इलाहाबाद
- मथुरा
- वाराणसी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) मथुरा
अवधारणा: यह प्रश्न हिंदी की उपभाषाओं और उनकी बोलियों के भौगोलिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों (Geographical and Cultural Centers) की समझ का परीक्षण करता है।
विवरण: ब्रजभाषा पश्चिमी हिंदी उपभाषा वर्ग की एक अत्यंत समृद्ध और ऐतिहासिक बोली है। 'ब्रज' शब्द का पारंपरिक अर्थ पशुओं या गायों का समूह (चारागाह) होता है। भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली होने के कारण मथुरा और इसके आस-पास का क्षेत्र (जैसे आगरा, अलीगढ़, धौलपुर, एटा, बदायूं) ब्रजप्रदेश कहलाता है। अतः ब्रजभाषा का केंद्रीय और मुख्य क्षेत्र मथुरा ही है। भक्तिकाल और रीतिकाल में यह हिंदी साहित्य की प्रमुख साहित्यिक भाषा रही है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- लखनऊ और इलाहाबाद (प्रयागराज) मुख्य रूप से अवधी बोली के क्षेत्र हैं।
वरुणासी प्रमुख रूप से भोजपुरी बोली का केंद्र है।
111प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।
रेखांकित शब्द का पर्यायवाची शब्द पहचानिए ।
- राकेश
- इंदु
- भानु
- राकापति
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) भानु
अवधारणा: यह प्रश्न दिए गए वाक्य में रेखांकित शब्द के अर्थ को समझकर उसके सही समानार्थक (पर्यायवाची) शब्द की पहचान करने की क्षमता का परीक्षण करता है।
विवरण: वाक्य में रेखांकित शब्द 'सूर्य' है। 'सूर्य' के प्रमुख पर्यायवाची शब्द दिनकर, दिवाकर, रवि, भानु, भास्कर, आदित्य आदि हैं। इसलिए विकल्प 3 सही है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- राकेश, इंदु और राकापति — ये तीनों शब्द 'चन्द्रमा' के पर्यायवाची शब्द हैं।
112त्यौहार के अवसर पर विशिष्ट व्यक्तियों का आगमन संतोष देता है। रेखांकित शब्द का विलोम शब्द पहचानिए।
- अस्त
- प्रस्थान
- आस्था
- निरास्था
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) प्रस्थान
व्याख्या: वाक्य में रेखांकित शब्द 'आगमन' है, जिसका अर्थ होता है 'आना' या 'पहुंचना'। व्याकरण के नियम के अनुसार, 'आगमन' का सटीक विलोम (विपरीतार्थक) शब्द 'प्रस्थान' होता है, जिसका अर्थ होता है 'जाना' या 'रवानगी'।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- अस्त का विलोम उदय होता है।
- आस्था का विलोम अनास्था होता है।
- निरास्था कोई मानक शब्द नहीं है (आस्था का सही विलोम अनास्था है)।
113आम के पेड़ हर घर में रोपना चाहिए। रेखांकित शब्द का तत्सम रूप पहचानिए।
- आमा
- अम्ल
- आम्र
- अमृ
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) आम्र
व्याख्या: वाक्य में रेखांकित शब्द 'आम' एक तद्भव शब्द है। संस्कृत के वे शब्द जो प्राकृत, अपभ्रंश से होते हुए परिवर्तित रूप में हिंदी में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें 'तद्भव' कहते हैं। 'आम' का मूल संस्कृत या तत्सम रूप 'आम्र' होता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- अम्ल का अर्थ 'खट्टा' या 'तेजाब/Acid' होता है (यह 'इमली' के तत्सम 'अम्लिका' से आंशिक रूप से भ्रमित करने के लिए दिया गया है)।
- आमा और अमृ व्याकरणिक रूप से अशुद्ध या निरर्थक विकल्प हैं।
114मात्राओं के आधार पर स्वरों के तीन भेद हैं। निम्न में से यह स्वर का भेद नहीं है।
- ह्रस्व स्वर
- अनुस्वार
- दीर्घस्वर
- प्लुत स्वर
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) अनुस्वार
व्याख्या: उच्चारण में लगने वाले समय या मात्रा के आधार पर स्वर के तीन मुख्य भेद होते हैं: ह्रस्व स्वर (एक मात्रा का समय), दीर्घ स्वर (दो मात्रा का समय), और प्लुत स्वर (तीन मात्रा का समय, जैसे- ओ३म्)।
अन्तर्निहित अवधारणा (Underlying Concept): अनुस्वार (ं) स्वर का भेद नहीं है। यह वर्णमाला में 'अयोगवाह' (Anusvara and Visarga) के अंतर्गत आता है। अयोगवाह वे वर्ण होते हैं जो न तो पूरी तरह स्वर होते हैं और न ही पूरी तरह व्यंजन। इसलिए, अनुस्वार स्वर का भेद नहीं है।
115आज सभा में ठाकुर आये। रेखांकित शब्द का स्त्रीलिंग रुप पहचानिए।
- ठकुरानी
- ठकुराइन
- ठाकुरनी
- ठाकुरनी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) ठकुराइन
व्याख्या: हिंदी व्याकरण में जातिवाचक, उपनाम या व्यवसाय सूचक पुल्लिंग शब्दों के अंत में '-आइन' प्रत्यय जोड़कर स्त्रीलिंग शब्द बनाए जाते हैं। जब 'ठाकुर' शब्द में '-आइन' प्रत्यय जोड़ा जाता है, तो आदि स्वर 'आ' का ह्रास होकर 'अ' हो जाता है और शब्द 'ठकुराइन' बनता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण: 'ठकुरानी', 'ठाकुनी' और 'ठाकुरनी' व्याकरण और वर्तनी (Spelling) की दृष्टि से अशुद्ध रूप हैं।
116सदैव बहुवचन में प्रयोग होने वाला शब्द पहचानिए।
- होश
- चिड़िया
- माता
- नहर
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) होश
व्याख्या: हिंदी व्याकरण में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनका प्रयोग हमेशा बहुवचन (Always Plural) के रूप में ही किया जाता है, इन्हें 'सदैव बहुवचन' शब्द कहते हैं। 'होश' ऐसा ही शब्द है (जैसे वाक्य प्रयोग: "शेर को सामने देखकर उसके होश उड़ गए")।
अन्तर्निहित अवधारणा (Underlying Concept): बाकी तीनों विकल्प एकवचन रूप में हैं और इनके बहुवचन रूप बनाए जा सकते हैं:
- चिड़िया का बहुवचन चिड़ियाँ होता है।
- माता का बहुवचन माताएँ होता है।
नहर का बहुवचन नहरें होता है।
117माता ______ बच्चों ______ सुलाया । सही कारक चिह्नों से खाली जगह भरिए ।
- ने , की
- ने , का
- ने , को
- का , को
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) ने , को
व्याख्या: वाक्य भूतकाल (Past Tense) में है और क्रिया 'सुलाया' एक सकर्मक (Transitive) क्रिया है। हिंदी व्याकरण के नियमानुसार, भूतकाल की सकर्मक क्रिया होने पर कर्ता के साथ 'ने' विभक्ति चिह्न (कर्ता कारक) का प्रयोग होता है। वाक्य में कार्य का फल 'बच्चों' पर पड़ रहा है, इसलिए कर्म के साथ 'को' विभक्ति चिह्न (कर्म कारक) का प्रयोग होगा। इस प्रकार पूर्ण और शुद्ध वाक्य "माता ने बच्चों को सुलाया।" बनेगा।
118रस के चार अंग माने जाते हैं । स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और चौथा यह है ।
- संचारी भाव
- आलंबन
- उद्दीपन
- सात्त्विक
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) संचारी भाव
व्याख्या: काव्यशास्त्र के अनुसार रस निष्पत्ति के लिए चार प्रमुख अंगों (अवयवों) का होना आवश्यक माना गया है: स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव (या व्यभिचारी भाव)। भरतमुनि के रससूत्र (विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः) में भी इनका उल्लेख है। इसलिए चौथा प्रमुख अंग 'संचारी भाव' है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- आलंबन और उद्दीपन विभाव के भेद हैं।
- सात्त्विक अनुभाव का एक भेद है।
- ये तीनों मुख्य अंग नहीं, बल्कि अंगों के अंतर्गत आने वाले उप-भेद हैं।
119इस मात्रिक छंद के प्रत्येक चरण में 13 मात्राएँ होती हैं । आठवीं मात्रा पर यति होती है । वह है -
- तोमर
- उल्लाला
- चौपाई
- अभीर
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) उल्लाला
व्याख्या: काव्यशास्त्र में 'उल्लाला' एक मात्रिक छंद की श्रेणी में आता है। कुछ प्राचीन व शास्त्रीय वर्गीकरणों के अनुसार, उल्लाला के लघु रूप के प्रत्येक चरण में 13 मात्राएँ होती हैं, जिसमें आठवीं मात्रा पर यति (विराम) का नियम होता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- तोमर छंद के प्रत्येक चरण में 12 मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु-लघु (ऽ।) अनिवार्य होता है।
- चौपाई एक सम मात्रिक छंद है, जिसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं।
- अभीर (या अहीर) छंद के प्रत्येक चरण में 11 मात्राएँ होती हैं।
120शब्दालंकार के प्रमुख प्रकार छः माने जाते हैं -
वे अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, वीप्सा और .......... हैं ।
- छेकानुप्रास
- वृत्यानुप्रास
- श्रुत्यानुप्रास
- पुनरुक्ति प्रकाश
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (4) पुनरुक्ति प्रकाश
व्याख्या: काव्यशास्त्र में मुख्य रूप से अलंकारों को तीन भागों में बाँटा गया है—शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार। जहाँ शब्दों के प्रयोग के कारण काव्य में सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। अधिकांश आचार्यों और आधुनिक व्याकरण के अनुसार शब्दालंकार के छह प्रमुख भेद माने जाते हैं: अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, वीप्सा और पुनरुक्ति प्रकाश (या पुनरुक्तवदाभास/पुनरुक्तिप्रकाश)। रिक्त स्थान में 'पुनरुक्ति प्रकाश' अलंकार ही सही बैठता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, और श्रुत्यानुप्रास स्वतंत्र शब्दालंकार नहीं हैं, बल्कि ये तीनों अनुप्रास अलंकार के उप-भेद हैं। इसलिए इन्हें मुख्य छह भेदों की सूची में अलग से नहीं गिना जा सकता।
121मुनिगण गणेश की पूजा तल्लीन हो कर, कर रहे हैं । रेखांकित शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए ।
- गणे + श, तत् + लिन
- गण + ईश, तत् + लन
- गण + ईश, तत् + लीन
- गण + ईश, त + ल्लीन
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) गण + ईश, तत् + लीन
- व्याख्या: इस प्रश्न में दो अलग-अलग संधि नियमों का परीक्षण किया गया है:
- गणेश = गण + ईश (गुण स्वर संधि): यहाँ प्रथम शब्द के अंत का 'अ' (ण में अ) और द्वितीय शब्द के प्रारंभ का 'ई' मिलकर 'ए' बन रहे हैं (अ + ई = ए)।
- तल्लीन = तत् + लीन (व्यंजन संधि): व्यंजन संधि के नियम के अनुसार, यदि 'त्' या 'द्' के बाद 'ल' आए, तो 'त्' या 'द्' भी आधा 'ल' (ल्) में बदल जाता है (त् + ल = ल्ल)।
- निष्कर्ष: विकल्प 3 में दोनों शब्दों का संधि-विच्छेद पूरी तरह शुद्ध और नियमानुकूल है।
122मैं आजीवन तुलसीकृत रामायण पढ़ कर मोक्ष प्राप्त करूँगा । रेखांकित शब्दों का समास -
- तत्पुरुष, तत्पुरुष
- अव्ययीभाव, तत्पुरुष
- तत्पुरुष, अव्ययीभाव
- द्वंद्व, तत्पुरुष
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) अव्ययीभाव, तत्पुरुष
- व्याख्या: इस प्रश्न में दो अलग-अलग समास नियमों का एक साथ परीक्षण किया गया है:
- आजीवन = जीवन भर (अव्ययीभाव समास): जिस समास का पहला पद प्रधान हो और वह अव्यय (जैसे यहाँ 'आ' उपसर्ग अव्यय के रूप में है) हो, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
- तुलसीकृत = तुलसी द्वारा कृत/रचित (तत्पुरुष समास - करण तत्पुरुष): जिस समास में उत्तरपद (दूसरा पद) प्रधान हो तथा दोनों पदों के बीच का कारक चिह्न (जैसे 'द्वारा') लुप्त हो जाता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।
निष्कर्ष: विकल्प 2 में दोनों शब्दों के समास का क्रम पूरी तरह सही और तार्किक है।
123उपवन में घूमने पर मन निर्मल हो जाता है । रेखांकित शब्दों में उपसर्ग पहचानिए ।
- उप, नि
- उप, निर्
- उ, निर
- उपा, नीर
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) उप, निर्
व्याख्या: उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के पूर्व (पहले) जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता लाते हैं।
- उपवन: इसमें मूल शब्द 'वन' है, जिसके पहले 'उप' उपसर्ग जुड़ा है।
- निर्मल: इसमें मूल शब्द 'मल' है। संस्कृत के संधि और उपसर्ग नियमानुसार, जब 'निर्' (हलन्त के साथ) उपसर्ग 'मल' के साथ जुड़ता है, तो 'र' रेफ (र्) बनकर म के ऊपर चला जाता है (निर् + मल = निर्मल)।
निष्कर्ष: विकल्प 2 में दिए गए दोनों उपसर्ग व्याकरणिक रूप से पूर्णतः शुद्ध हैं। विकल्प 3 में 'निर' बिना हलन्त के है, जो अशुद्ध है।
124पढ़ाई के समय लड़ाई मत करो । रेखांकित शब्दों में प्रत्यय पहचानिए ।
- ई, ई
- अई, ई
- आई, आई
- ई, अई
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) आई, आई
व्याख्या: प्रत्यय वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द या धातु के अंत में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता लाते हैं।
- पढ़ाई: यह क्रिया धातु 'पढ़' में 'आई' भाववाचक कृत प्रत्यय जोड़ने से बना है (पढ़ + आई = पढ़ाई)।
- लड़ाई: यह भी क्रिया धातु 'लड़' में 'आई' प्रत्यय जोड़ने से बना है (लड़ + आई = लड़ाई)।
पेडागॉजिकल सिद्धांत (Concept): ये दोनों शब्द 'कृत प्रत्यय' (Krit Pratyaya) के अंतर्गत आते हैं क्योंकि ये क्रिया धातुओं के अंत में लगकर भाववाचक संज्ञा का निर्माण कर रहे हैं। अतः विकल्प 3 पूरी तरह सही है।
125होली के दिन हमारे घर में चाँदी के गिलासों में शरबत और लड्डू बाँटते हैं । रेखांकित शब्दों में निहित संज्ञा के भेदों को पहचानिए ।
- व्यक्तिवाचक, द्रव्यवाचक, द्रव्यवाचक, समूहवाचक
- व्यक्तिवाचक, द्रव्यवाचक, द्रव्यवाचक, जातिवाचक
- जातिवाचक, द्रव्यवाचक, द्रव्यवाचक, जातिवाचक
- व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, द्रव्यवाचक, जातिवाचक
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) व्यक्तिवाचक, द्रव्यवाचक, द्रव्यवाचक, जातिवाचक
- व्याख्या: वाक्य में रेखांकित चारों शब्दों के संज्ञा भेद इस प्रकार हैं:
- होली: यह एक विशेष त्योहार का नाम है, इसलिए यह व्यक्तिवाचक संज्ञा है।
- चाँदी: यह एक धातु या पदार्थ का नाम है, इसलिए यह द्रव्यवाचक संज्ञा है।
- शरबत: यह एक तरल पदार्थ (पेय) है, इसलिए यह भी द्रव्यवाचक संज्ञा की श्रेणी में आता है।
- लड्डू: यह एक खाद्य पदार्थ/मिठाई की पूरी जाति या वर्ग का बोध कराता है, इसलिए यह जातिवाचक संज्ञा है।
- निष्कर्ष: इन चारों का सही क्रम केवल विकल्प 2 में दिया गया है।
126वह रोटी जली हुई है, इसलिए उसने कुछ नहीं खाया । रेखांकित शब्दों में निहित सर्वनाम के भेदों को पहचानिए ।
- निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक
- निजवाचक, निश्चयवाचक
- निश्चयवाचक, निश्चयवाचक
- अनिश्चयवाचक, निश्चयवाचक
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक
- व्याख्या: वाक्य में रेखांकित सर्वनाम शब्दों का वर्गीकरण इस प्रकार है:
- वह: यह शब्द किसी निश्चित वस्तु (रोटी) की ओर संकेत कर रहा है, इसलिए इसे निश्चयवाचक सर्वनाम (संकेतवाचक) माना जाता है।
- कुछ: यह शब्द किसी अनिश्चित वस्तु या मात्रा का बोध कराता है (जैसे यह ज्ञात नहीं है कि क्या नहीं खाया), इसलिए यह अनिश्चयवाचक सर्वनाम है।
- निष्कर्ष: इन दोनों सर्वनाम भेदों का सही संयोजन केवल विकल्प 1 में दिया गया है।
127वृद्धावस्था में करोड़ों रुपयों की जरुरत नहीं है । बल्कि सहारा बनकर साथ रहनेवालों की जरुरत है । रेखांकित शब्द विशेषणों के कौन-कौन से भेद माने जाते हैं ।
- गुणवाचक, परिमाणवाचक
- परिमाणवाचक, संख्यावाचक
- गुणवाचक, निर्देशक विशेषण
- गुणवाचक, संख्यावाचक
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (4) गुणवाचक, संख्यावाचक
- व्याख्या: वाक्य में रेखांकित पदों के विशेषण रूप और उनके भेद इस प्रकार निर्धारित किए गए हैं:
- वृद्धावस्था: यह मूल रूप से जीवन की एक अवस्था (दशा) का बोध कराता है। व्याकरणिक रूप से जब यह किसी संदर्भ में विशेषता प्रकट करने का माध्यम बनता है, तो इसे अवस्था/दशा बोधक गुणवाचक विशेषण के वर्ग के अंतर्गत स्वीकार किया जाता है।
- करोड़ों: यह शब्द रुपयों की संख्या का बोध करा रहा है। चूँकि इससे निश्चित संख्या का पता नहीं चलता (यह एक अनुमानित संख्या है), इसलिए यह अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण है।
निष्कर्ष: इस प्रकार दोनों रेखांकित शब्दों के विशेषण भेदों का सही युग्म क्रमशः 'गुणवाचक' और 'संख्यावाचक' होगा, जो कि विकल्प 4 में दिया गया है।
128निम्न में से सकर्मक क्रिया पहचानिए ।
- उसका सिर खुजलाता है ।
- श्याम सोता है ।
- राम रोटी खाता है ।
- सीता हँसती है ।
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) राम रोटी खाता है ।
व्याख्या: जिस क्रिया के साथ 'कर्म' (Object) होता है या कर्म के होने की संभावना होती है, उसे सकर्मक क्रिया (Transitive Verb) कहते हैं। इस वाक्य में क्रिया 'खाता है' का सीधा प्रभाव कर्ता पर न पड़कर 'रोटी' (कर्म) पर पड़ रहा है। यदि हम प्रश्न करें "राम क्या खाता है?", तो उत्तर मिलता है "रोटी"।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- "श्याम सोता है" और "सीता हँसती है" में क्रिया का फल सीधे कर्ता पर पड़ रहा है, अतः ये अकर्मक क्रियाएँ (Intransitive Verbs) हैं।
- "उसका सिर खुजलाता है" वाक्य में 'खुजलाता है' का प्रयोग यहाँ अकर्मक रूप में हुआ है (यदि वाक्य "वह अपना सिर खुजलाता है" होता, तो यह सकर्मक होता)।
129यदि मूल क्रिया 'खाना' है तो दूसरी प्रेरणार्थक क्रिया यह है ।
- खिलाना
- खिलवाना
- ख़ाना
- खा
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) खिलवाना
व्याख्या: जब कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी अन्य को कार्य करने की प्रेरणा देता है, तो उसे प्रेरणार्थक क्रिया (Causative Verb) कहते हैं। प्रेरणार्थक क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं:
- प्रथम प्रेरणार्थक: इसमें कर्ता स्वयं प्रेरक बनकर प्रेरणा देता है। मूल क्रिया के अंत में 'आना' लगाने से यह बनती है (जैसे: खाना → खिलाना)।
- द्वितीय (दूसरी) प्रेरणार्थक: इसमें कर्ता स्वयं कार्य में प्रत्यक्ष भाग न लेकर किसी तीसरे से कार्य करवाता है। मूल क्रिया के अंत में 'वाना' प्रत्यय लगाने से यह रूप बनता है (जैसे: खाना → खिलवाना)।
निष्कर्ष: प्रश्न में "दूसरी प्रेरणार्थक क्रिया" पूछा गया है, इसलिए 'खिलवाना' सही उत्तर है जो कि विकल्प 2 में है।
130निम्न में से 'यौगिक क्रिया विशेषण' शब्द यह है ।
- अब
- फटाफट
- जहाँ
- यथाशक्ति
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) फटाफट
व्याख्या: रूप या उत्पत्ति के आधार पर क्रिया-विशेषण के तीन मुख्य भेद होते हैं—मूल क्रिया-विशेषण, यौगिक क्रिया-विशेषण और स्थानीय क्रिया-विशेषण।
- यौगिक क्रिया-विशेषण: वे क्रिया-विशेषण शब्द जो किसी अन्य शब्द, संज्ञा, सर्वनाम, प्रत्यय या शब्दों की द्विरुक्ति (पुनरावृत्ति/अनुकरण) के मेल से बनते हैं, उन्हें यौगिक क्रिया-विशेषण कहते हैं। 'फटाफट' शब्द 'फट' ध्वनि की द्विरुक्ति या अनुकरण सूचक शब्दों के मेल से बना यौगिक शब्द है, जो क्रिया की रीति (तरीके) को बताता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- अब और जहाँ स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने वाले मूल क्रिया-विशेषण हैं।
131आपका काम हो जाएगा ; आप निश्चिंत रहे । इस वाक्य में प्रयुक्त ( ; ) चिह्न . यह है -
- पूर्ण विराम
- अल्प विराम
- अर्द्धविराम
- उद्धरण चिह्न
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (3) अर्द्धविराम
व्याख्या: वाक्य में प्रयुक्त चिह्न ( ; ) को हिंदी व्याकरण में 'अर्द्धविराम' (Semicolon) कहा जाता है।
अन्तर्निहित अवधारणा (Concept): जब किसी वाक्य को पढ़ते या बोलते समय 'अल्प विराम' ( , ) से अधिक और 'पूर्ण विराम' ( । ) से कम समय के लिए रुकना पड़ता है, तब वहाँ अर्द्धविराम ( ; ) का प्रयोग किया जाता है। अक्सर दो स्वतंत्र उपवाक्यों को जोड़ने के लिए, जिनमें गहरा संबंध हो लेकिन वे बिना किसी संयोजक अव्यय (और, लेकिन आदि) के लिखे गए हों, इस चिह्न का उपयोग होता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- पूर्ण विराम का चिह्न ( । ) होता है।
- अल्प विराम का चिह्न ( , ) होता है।
उद्धरण चिह्न का चिह्न ( " " ) या ( ' ' ) होता है।
132वह चोरी करके बदनाम हुआ । इस वाक्य से जुड़े सही मुहावरे को पहचानिए -
- मुँह धोना
- मुँह काला होना
- मुँह में पानी आना
- मुँह फेरना
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) मुँह काला होना
व्याख्या: वाक्य में "बदनाम हुआ" वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। हिंदी व्याकरण और लोक-व्यवहार में 'मुँह काला होना' (या मुँह काला करना) मुहावरे का सुस्पष्ट अर्थ 'बदनामी होना' या 'कलंकित होना' होता है। अतः इस वाक्य के भाव को व्यक्त करने के लिए विकल्प 2 सबसे सटीक मुहावरा है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- मुँह धोना का अर्थ होता है आशा न रखना (जैसे: अब इस वस्तु से मुँह धो लो)।
- मुँह में पानी आना का अर्थ होता है लालच आना।
- मुँह फेरना का अर्थ होता है उपेक्षा करना या विमुख होना।
133'सौ सयाने एक मता' इस लोकोक्ति का अर्थ यह है -
- कुछ भी निश्चित न कर पाना ।
- ज्यादा चालाक बनना ।
- अच्छे विचारों में भिन्नता ।
- बुद्धिमानों के विचार एक जैसे होना
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (4) बुद्धिमानों के विचार एक जैसे होना
व्याख्या: 'सौ सयाने एक मता' हिंदी भाषा की एक सुप्रसिद्ध लोकोक्ति (कहावत) है। 'सयाने' का अर्थ होता है बुद्धिमान या चतुर व्यक्ति और 'मता' का अर्थ होता है विचार या सम्मति। इस लोकोक्ति का वास्तविक अर्थ यह होता है कि जो लोग बुद्धिमान और गंभीर होते हैं, वे किसी समस्या या विषय पर विचार करते समय लगभग एक ही निष्कर्ष या निर्णय पर पहुँचते हैं, अर्थात् उनके विचारों में एकता होती है। अतः विकल्प 4 सर्वथा शुद्ध है।
134चित्रा को जन्मदिन के अवसर पर इन्होंने नये कपड़े भेंट किए -
- मामा - मामी
- चाचा - चाची
- दादा - दादी
- नाना - नानी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) चाचा - चाची
व्याख्या: यह प्रश्न AP TET परीक्षा के अंतर्गत पाठ्यपुस्तक आधारित विषय-वस्तु (Content) खंड से पूछा गया है। दी गई कहानी या गद्यांश के संदर्भ के अनुसार, चित्रा को उसके जन्मदिन के अवसर पर 'नये कपड़े' उपहार में देने वाले पात्र 'चाचा - चाची' थे।
अन्तर्निहित सिद्धांत (Concept): यह प्रश्न प्राथमिक/उच्च प्राथमिक स्तर की हिंदी पाठ्यपुस्तकों में संकलित कहानियों के मुख्य पात्रों और उनके द्वारा किए गए कार्यों/घटनाक्रमों के स्मरण और अवबोध की क्षमता का परीक्षण करता है।
135"ज्ञान हमको दीजिए" कविता के कवि राम नरेश त्रिपाठी का जीवन काल यह है -
- 1889 से 1962
- 1886 से 1947
- 1888 से 1961
- 1887 से 1967
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (1) 1889 से 1962
व्याख्या: "ज्ञान हमको दीजिए" (हे प्रभु आनंददाता...) प्रार्थना कविता के रचयिता द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि राम नरेश त्रिपाठी हैं। उनका जन्म 4 मार्च 1889 को कोइरीपुर (जौनपुर, उत्तर प्रदेश) में हुआ था तथा उनका निधन 16 जनवरी 1962 को हुआ था।
अन्तर्निहित सिद्धांत (Concept): यह प्रश्न आंध्र प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (AP TET) के अंतर्गत हिंदी पाठ्यपुस्तकों में शामिल प्रसिद्ध रचनाकारों के कवि परिचय (लेखक परिचय) खंड के ऐतिहासिक और तथ्यात्मक ज्ञान का परीक्षण करता है। परीक्षा में मुख्य कवियों के जन्म एवं मृत्यु वर्ष से जुड़े प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
136राजा कृष्णदेवराय ने तेनालीराम की चतुराई से खुश होकर ये दी -
- चाँदी
- आभूषण
- जमीन
- ईनाम
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (4) ईनाम
व्याख्या: यह प्रश्न आंध्र प्रदेश की स्कूली हिंदी पाठ्यपुस्तक में संकलित 'तेनालीराम' (या कृष्णदेवराय और तेनालीराम की कहानियों) से संबंधित पाठ से लिया गया है। कहानी के कथानक के अनुसार, राजा कृष्णदेवराय तेनालीराम की बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने पुरस्कार स्वरूप उसे 'ईनाम' दिया।
अन्तर्निहित सिद्धांत (Concept): यह प्रश्न परीक्षार्थी के पाठ्यपुस्तक आधारित ज्ञान और कहानियों के प्रमुख घटनाक्रमों के स्मरण व अवबोध (Comprehension) की क्षमता का मूल्यांकन करता है। AP TET परीक्षा में पाठों के सारांश और मुख्य पात्रों से जुड़े तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
137शैलेंद्र कुमार जी इतनी बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किये गये -
- चार
- तीन
- पाँच
- दो
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) तीन
व्याख्या: हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के महान कवि और गीतकार शैलेंद्र (शंकरदास केसरीलाल) को उनके उत्कृष्ट गीतों के लिए उनके जीवनकाल और मरणोपरांत तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार Wikipedia से सम्मानित किया गया था:
- वर्ष 1959: फिल्म 'यहूदी' के गीत "ये मेरा दीवानापन है" के लिए।
- वर्ष 1960: फिल्म 'अनाड़ी' के गीत "सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी" के लिए।
- वर्ष 1969 (मरणोपरांत): फिल्म 'ब्रह्मचारी' के गीत "मैं गाऊँ तुम सो जाओ" के लिए।
अन्तर्निहित सिद्धांत (Concept): यह प्रश्न कक्षा 10 की हिंदी पाठ्यपुस्तक (स्पर्श भाग-2) में संकलित प्रहलाद अग्रवाल द्वारा रचित अध्याय 'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' के लेखक/कवि परिचय और पाठ्य-सामग्री के तथ्यात्मक बोध पर आधारित है।
138दसवीं कक्षा के इस पाठ में बड़े-बुजुर्गों के प्रति आदर की भावना दर्शायी गयी है ।
- लोकगीत
- ईदगाह
- स्वराज्य की नींव
- दक्षिणी गंगा गोदावरी
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (2) ईदगाह
व्याख्या: 'ईदगाह' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित बाल-मनोविज्ञान पर आधारित एक अमर कहानी है। इस पाठ का मुख्य पात्र 'हामिद' नाम का एक छोटा अनाथ बच्चा है, जो ईद के मेले में अपने लिए खिलौने या मिठाइयाँ न खरीदकर अपनी बूढ़ी दादी 'अमीना' के लिए एक चिमटा खरीदता है ताकि रोटियाँ सेकते समय उसकी उंगलियाँ न जलें। यह कहानी बच्चों में त्याग, समझदारी और अपने बड़े-बुजुर्गों के प्रति अपार आदर, प्रेम और संवेदनशीलता की नैतिक भावना को बहुत ही सुंदर ढंग से उजागर करती है।
अन्तर्निहित सिद्धांत (Pedagogical Principle): यह प्रश्न पाठ्यपुस्तक की विषय-वस्तु (Content Knowledge) के साथ-साथ साहित्य के माध्यम से जीवन मूल्यों (Value Education) और चरित्र निर्माण के शिक्षण सिद्धांतों का मूल्यांकन करता है।
उत्तर-कुंजी (Answer Key 91–138)
| प्र. | उत्तर | प्र. | उत्तर | प्र. | उत्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| 91 | (2) | 107 | (1) | 123 | (2) |
| 92 | (1) | 108 | (2) | 124 | (3) |
| 93 | (1)/(4) | 109 | (3) | 125 | (2) |
| 94 | (3) | 110 | (3) | 126 | (1) |
| 95 | (1) | 111 | (3) | 127 | (4) |
| 96 | (3) | 112 | (2) | 128 | (3) |
| 97 | (2) | 113 | (3) | 129 | (2) |
| 98 | (4) | 114 | (2) | 130 | (2) |
| 99 | (2) | 115 | (2) | 131 | (3) |
| 100 | (1) | 116 | (1) | 132 | (2) |
| 101 | (3) | 117 | (3) | 133 | (4) |
| 102 | (2) | 118 | (1) | 134 | (2) |
| 103 | (3) | 119 | (2) | 135 | (1) |
| 104 | (2) | 120 | (4) | 136 | (4) |
| 105 | (3) | 121 | (3) | 137 | (2) |
| 106 | (4) | 122 | (2) | 138 | (2) |
प्रश्न 1–90 के लिए इस ब्लॉग के अन्य AP TET 2026 पोस्ट देखें।
